Saturday, May 30, 2009

किसी राह्पर.......अन्तिम

Sunday, April 5, 2009
किसी राह्पर.......अन्तिम
इतनेमे फिर दरवाज़की घंटी बजी। उसने दरवाज़ा खोला। एक जोडा अन्दर आया। संगीताने उनका परिचय कराया,"आप है मिस्टर और मिसेस राय ,और ये है मिस्टर साठे।"
फिर राय दम्पतीकी ओर मुखातिब होके बोली,"हमे चलना चाहिऐ, हैना?मि.साथे, हम लोग जब्भी मौक़ा मिलता है,पास के vruddhaashram मे जाते है,वहाँ पर भिन्न,भिन्न संस्कृतिक कार्यकम करते हैं, गाते बजाते हैं,उन्हें घुमानेभी ले जाते हैं। हमारा बैंक ऐसे कई कार्यक्रम स्पोंसर करता है। कुल मिलके बडे मज़से वक़्त कटता है हमारा!" उस पूरी शाम मे संगीता पहली बार इतना उल्लसित होकर बतिया रही थी,लेकिन उसका "मि.साठे"संबोधन सागर को झकझोर गया।
पर्स लेकर वो दरवाज़के पास खडी हो गयी,सागर के लिए बाहर निकल जानेका ये स्पष्ट संकेत था। सागर बाहर निकला । संगीता अपने साथियोंके साथ कारमे बैठी और निकल गयी। शायद आगे ज़िन्दगीमे उसे उसके लायक कोई मीत मिल जाये क्या पता.....ऐसा कि जिसे संगीता जैसे रत्न की परख हो! सागर ने एक आह-सी भरी....उसके हाथोंसे वो हीरा तो निकल ही गया था....उसीकी मूर्खता के कारण।
जिस मोड़ पे सागर ने संगीता को छोड़ा था वहाँसे वो कहीं आगे, दूर और बोहोत ऊंचाई पे पोहोंच गयी थी !
समाप्त।
Posted by Shama at 10:47 AM

3 comments:

Pradeep Kumar said...

bahut achchhi, marmik aur disha pradhaan kahaani hai . kahaani ka ant beshak paaramprik na ho magar hai sau feesadi sahee. har kisi ko apni raah chunne ka haq hai. zindagi koi film nahi hai ki paschaataap karo aur anmol heera fir se jholi main aa gire.
itni sundar kahaani ke liye badhaaie!

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

आज इस ब्लाग पर पहली बार आया,बहुत अच्छा लगा.
क्या अभिव्यक्ति है.....वाह.कहानी बहुत अच्छी लगी.

amarjeet kaunke said...

shama ji, apki kahani bahut dil ko chho lene wali hai...aurat aur mard ki bhavnao ko tulnatmk roop me ap ne bahut hi khubsurti se pesh kia hai..kahani ka ant ek aasha k sath kia gia hi.aisi kahaani k liye ap ko bahut mubark...........amarjeet kaunke