Sunday, August 2, 2009

याद आती रही...! ८

( पूर्व भाग: अपने अतीत के खयालों में खोयी विनीता,न जाने कब सो गई...)

जब झिलमिल परदों से छन के धूप उसकी आँखों पे पडी, तो उसके साथ,साथ उसकी ज़िंदगी, फिर एक बार जाग उठी...

अखबार वाले ने अखबार अन्दर खिसका दिया था..दरवाजा खोल उसने दूध की थैली अन्दर कर ली ..पीले गुलाब...! उसे फूलों के लिए फोन करना था...! झट पट फोन घुमाके ,पूरे चौबीस पीले गुलाबों का आर्डर उसने दे दिया...घरका पता समझाया...साथ ही कहा," एकेक फूल चुनके चाहिए...अधखिला...!"

हाँ...और आज वो ब्यूटी पार्लर ज़रूर जायेगी...वहाँ जाके शैंपू करायेगी..बाल निखर जायेंगे...pedicure, manicure,
facial ...सब कुछ करायेगी...उसे खूब निखर जाना है...सुंदर दिखना है...शायद विनय थोड़ी-सी देर क्यों न मिलके चला जाय...फिरभी उसके मनमे अपनी,एक ऐसी छवी बना दूँगी, जिसे वो ताउम्र भूल नही पायेगा...उसने सोचा...आगे पीछे कुछ भी हो जाय, उस शाम वो उसपे ऐसे बरसेगी, मानो किसी नगमे पे बरसता संगीत...!

वह पार्लर गयी...गुदानों में फूल सजे..अब घड़ी के काँटे की तरफ़ उसकी नज़र बार,बार घूम रही थी..विनयने उसे चार बजे का समय दिया था...!
एकबार फिर आदम क़द आईने के सामने खड़ी हुई...और खुदको न जाने कितनी बार निहारा...! सच...उसकी उम्र से मानो किसी ने दस साल चुरा लिए हों,ऐसा प्रतीत हो रहा था...!

जिस पुरूष ने उसे इतना तड़पाया था, इतना रुलाया था, इतनी वेदना पहुँचाई थी, उसी के लिए वह इतनी बेताब हुए चली जा रही थी...?विनीता, तू भी क्या मोम की बनी हुई है? अरे कहाँ तो तूने सोचा था, कि, गर कभी कभी वो सामने दिख गया तो एक चाँटा रसीद देगी...और अब ?
अरे...! बरसों तेरे सपनों में तकरीबन वह रोज़ आता रहा है...किन,किन रूपों में...कभी तेरा दूल्हा बन, तो कभी तेरे साथ समंदर के किनारे घुमते हुए, तो कभी तेरा हाथ अपने हाथमे पकड़, तेरी आँखों में गहराई से झाँकते हुए...इन सपनों से जब भी जागती तो कितनी उदास हो जाती थी तू...!

अब...! अब चंद लम्हों की खुशियाँ होंगी शायद ये....ज़्यादा दामन मत फैलाना....ज़्यादा उम्मीद मत रखना..फिर से पछताएगी...इन पल दो पलों से एक उम्र चुरा लेना...तेरे नसीब में यही एक शाम लिखी हो शायद...!

इतने में दरवाज़े की घंटी बजी...एक आख़री नज़र आईने पे डाल, उसने लपक के दरवाजा खोला...!

दरवाज़े पे विनय नही, दफ्तर की किरण खड़ी थी..! विनीता को देख कर उसने एक हल्कि-सी सीटी बजायी और बोली," हाय, हाय ! वारी जाऊँ...! गर बॉस देख ले तो, कैमरा के पीछे नही,आगे खड़ा कर दे...! क्या लग रही है...! कहाँ की तैय्यारी है...? मै तो तुझे पृथ्वी थिएटर ले जाने आयी थी...बड़ा अच्छा नाटक है...पर यहाँ तो कुछ और ही अंदाज़ नज़र आ रहा है ! ! बोल ना...क्या बात है...? वादा करती हूँ...किसी को नही बताउंगी ...!"

बातूनी किरण, बोले चली जा रही थी..बड़े साफ़ दिल की थी वह...हमेशा विनीता का भला चाहती रही थी...लेकिन इस वक़्त विनीता को उस पे बड़ी खिज आ रही थी...! बेवक़्त जो टपक पडी थी...!

"उफ़ ! किरण....कितनी बकबक करती है तू...! बता दूँगी, गर ऐसा कुछ हुआ तो, जैसा कि, तू सोच रही है...बड़े दिनों से वही घिसी-पिटी साडियाँ...या फिर जींस पहन के तंग आ चुकी थी..सो ये पहन ली.....एक कॉलेज के समय की सहेली आ रही है...उसके साथ कहीँ जा रही हूँ...," विनीता किरण को दफा करने के मूड में बोल पडी...उसने किरण को ना तो बैठने के लिए कहा ना चाय पूछी..! बेचारी किरण दरवाज़े परसे ही लौट गयी...

अब तक चार बज के दस मिनट हो चुके थे...विनीता को अब ख़याल आया,कि, उसने अपना नंबर तो विनय को दे दिया था...उसका नही लिया था...अब वह उसकी देरी की वजह भी जान नही सकेगी...! एकेक मिनट काटना मानो एकेक युग के बराबर लग रहा था...पाँच मिनट और कटे...वह कमरे के चक्कर कटे चली जा रही थी...और फिर एकबार घंटी बजी...

क्रमश:

4 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

bahut bhavna pradhan likh rheen hain ,injaar rhega.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

पोस्ट भाव-प्रधान है।
अगली कड़ी की प्रतीक्षा है।

ज्योति सिंह said...

itna sundar post aur chuk gayi rahi ,dono bhag padhe achchha laga .

dr.aalok dayaram said...

इतना सजीव और भावात्मक चित्रण बन पडा है कि कहानी नहीं हकीकत लगती है। मन के पटल पर बरबस संवेदनाएं उभर आती हैं। अति श्रेष्ठ! शुभ कामनाएं !