Wednesday, April 8, 2009

नैहर

नैहर (कहानी)
पिछले एक महीने से अलग,अलग नलियो मे जकड़ी पडी तथा कोमा मे गयी अपनी माँ को वो देख रही थी । कभी उस के सर पे हाथ फेरती , कभी उसका हाथ पकड़ती। हर बार उसे पुकारती,"माँ!देखो ना!मैं आ गयी हूँ!"
उसके मन मे आशा एक नन्हा-सा दिया टिमटिमाता रहता। शायद आख़री सांस लेनेसे पहेले किसी तरह उसकी माको पता चले कि उसकी लाडली बेटी मृत्युशया के पास थी। मन ही मन वल हज़ारों बार इश्वर से बिनती करती रहती,हे भगवान्!सिर्फ एक बार इसकी आँखें खुलवा दो,मुझे देख लेने दो,मेरे नजदीक होने का एहसास दिलवा दो।
लेकिन ऐसा हुआ नही। एक बार पूरी रात उसकी आंख नही लगी,पर तड़के झपकी लग गयी। जब डाक्टर माँ को देखने कमरे मे आये तो वो hadbada के जग पडी। डाक्टर ने हमेशा की तरह उस की माँ को तपासने की शुरुआत की और तुरंत उस की ओर मुड़ के बोले,"I ऍम सॉरी शी इस नो मोर"।

डाक्टर उसके परिवार के पुराने परिचित थे। उनका अक्सर उसके पीहर मे आना जाना हुआ करता था। उन्हों ने धीरे से उसके कन्धों पे थपथपाया। नर्स ने माँ को लगी हुई नलिया निकालने की शुरुआत कर दीं। उसकी आंखों से आँसू ओंकी धारा बहने लगी थी। उसके पास होने का कोई भी एहसास उसकी माँ को नही हुआ था। उसने आने मे बोहोत देर कर दीं थी। "माँ!तुमने मुझे कितनी बड़ी सज़ा दीं",उसका मन दर्द से कराह उठा।
उसके बाद धीरे,धीरे जोभी विधियां होनी थी होती रही। लोगों को फोन किये गए। उनके फार्म हौस पे लोग इक्ट्ठे हो गए। उसका भाई रीती रिवाज निभाता रहा। वो गुमसुम-सी देखती रही।

जब घर पे काम करने वाली औरतों ने ज़ोर से रोना धोना शुरू किया तब वो बेसाख्ता उन पे चींख उठी ,"खामोश!रोना है तो बाहर निकल जाओ!"
इन सब औरतों के साथ उसके पिता के कभी ना कभी अनैतिक संबंध रह चुके थे। उसे बेहद घुस्सा आया। उन औरतों के जिस्म पे सोना था,उन के पक्के घर बन चुके थे। माँ को उसके पिता ने कभी सोने की चेन तक नही दीं थी। माँ ने खुद ये सब झेल कर भी कभी किसी को बताया नही था। उसीने एकबार अपनी आंखों से देख लिया था। अपने आपे से बाहर हो गयी थी वो तब। इतनी सुन्दर, शालीन,गुणवती पत्नी होने के बावजूद उसके पिता ने ऐसा क्यों किया?अपने पितापे आये क्रोध के कारण उसने अपने पीहर जाना काफी कम कर दिया था।
वो काफी प्रतिथ यश वकील थी। माँ पर होने वाले अन्याय होने वाले एहसास होने के बाद उसने उस किस्म की परिस्थितयों से गुजरने वाली महिलाओं से फ़ीस लेनी बंद कर दीं थी। लेकिन माँ उसे बार, बार बुलाती रहती । उसे कहती, ''मेरी खातिर आओ। हमेशा दो दिन रहके लॉट जाती हो। तुम से कितनी सारी बांतें करने का मन होता है। कभी तो समय निकाल कर आठ-दस रोज़ आओ। मैंने तो कोई गुनाह नही किया। देखो, मैंने सब कुछ हँसते ,हँसते सह लिया। शायद यही मेरी किस्मत थी। मेरे पास और कोई रास्ता नही था। बच्चों को लेके मैं कहॉ जाती?मेरा तो कोई पीहर नही था!!तेरा है। कयी बार मन करता है,तेरा सर अपनी गोद मे रख कर सहलाती रहूँ। "
माँ की बिनती हमेशा चालू रहती। कभी,कभी वो अपनी बेटी को भेज देती। नानी-नवासी की ख़ूब पटती। मानो दोनो बड़ी गहरी सहेलियां हो!उसकी बेटी शादी के बाद जब ऑस्ट्रेलिया चली गयी तब माँ कितना रोई थी!!
माँ की एक फुफेरी बहन Hyderabad मे रहती थी। दोनोका आपस मे बड़ा लगाव था। कभी कभार माँ उसे और उसके छोटे भाई को लेके हैदेराबाद जाती। मौसी उनके ख़ूब लाड करतीं। मौसी के पांच बच्चे थे। उसकी माली हालत भी कुछ खास अच्छी नही थी। माँ भी बिना आरक्षण थर्ड क्लास मेही सफ़र किया करती। लॉट ते समय मौसी सभी को कपडे खरीद देंती । लेकिन माँ ने मौसी को कभी कुछ दिया हो,उसे याद नही। उसके पिता उसकी माँ को कभी अपनी मर्जी से खर्च करने के लिए कुछ पैसे देतेही नही थे।

इतने मे भाई ने हलके से उसके कन्धों पे हाथ रखा। "वासांसि जीर्नानि यथा विहाय,नवानि गृन्हाती नारोपरानी। तथा शरीरानी विहाय, जीर्न्यानी अन्यानी संयाति नवानि देही। "यह सब मंत्रोच्चार हो चुके थे। और भी जो कुछ होना था हो चुका था। माँ की अन्तिम यात्रा शुरू होने वाली थी। उसे उठाया गया। बाहर लाया गया। घर गेट से दूर था। वो गेट तक गयी और देर तक देखती रही। उसकी जननी कभी ना लौटने के लिए जा रही थी......

कुछ देर बाद bhai लौटा.....कितना समय लगा उसे पता नही चला। स्नानादि हो गए। कुछ लोग रुके, कुछ लोग चले गए । अचानक उसके ख़्याल मे आया,माँ की चिता की साथ,साथ उसका नैहर भी जल गया था। अब वो किसीकी गोद मे अपना सर नही रख पायेगी......

दस बारह दिनों बाद वो वापस लॉट गयी। उसकी बेटी ऐसे समय मे ऑस्ट्रेलिया से आयेगी ऎसी उसे भोली-सी उम्मीद थी। लेकिन वो नही आ पायी। "सिर्फ हफ्ता भर आओ,"कहके उसने बड़ा आग्रह किया,लेकिन वो नही आयी। अब उसे महसूस हुआ कि,जब उसे उसकी माँ बुलाती रहती और वो नही जाती तो उसकी माँ पे क्या गुज़रती होगी।

दिन बीतते गए। उसका भाई उसे कभी कभार बुलाता लेकिन माँ बिना सूने घर मे जाने से वो कतराती तथा एक अपराध बोध भी सताता। फिर एक दिन उसके भाई का फ़ोन आया। उसने वो पुश्तैनी घर तथा आसपास की ज़मीन बेचने का फैसला किया था।
उसने कहा,"माँ एक बैग आपके लिए रखा था, वो मेरी नज़रों से परे हो गया और मैं आप को बताना ही भूल गया। अबके आप ज़रूर आईये और अपने घर को आखरी बार देख भी जाईये ',कहते हुए भाई का गला भी भर आया। अब उसने जाने का निश्चय कर ही लिया और वो गयी भी।

वो पोहोंची तबतक काफी सामान पैक हो चुका था। माँ को बगीचे मे काम करने का बेहद शौक़ था।शायद अपने मन की गहराई मे छुपे दर्द से ध्यान हटाने का उसका वो एक तरीका था। रॉक गार्डन ,अलग,अलग रितुओं मे होने वाले फूल,किस्म,किस्म,की बेलें,मोतियां तथा गुलाब की क्यारियां,ख़ूब सारे crotans , तथा और कयी सारे पौधों से बगिया सजी रहती थी। कयी बार आसपास के लोग खास उस बगीचे को देखने आते....

उसने उस बगीचे मे एक नज़र फैलायी और उसे उस बगीचे के भग्नावशेष भी नही दिखाई दिए.... कुछ अधमरे पौधे तथा कुछ क्यारियां जिनमे उग रही घांस के अलावा वहाँ कुछ भी नही था...
सुबह उठके वो बाहर आयी। वहाँ वो पुराना,दादाजी के हाथ का लगा नीम का पेड खङा था। कितनी मीठी,मीठी स्मृतियां जुडी थी उस पेड के साथ!!हाँ, उस पे एक ज़माने मे बंधा झूला अब नही था। उस झूले पे दादाजी उसे झुलाया करते थे....
सामने हारसिंगार का पेड था। उसपर बचपन मे खेले खेल याद aate रहे। नीचे बिखरे फूल याद आये,सफ़ेद,छोटे ,छोटे,लाल,लाल टहनी वाले....
वो बकुल का पेड जिसकी टहनियों पे बैठ कर वो श्लोक कवितायेँ आदि याद करती थी वहीं था, गुज़रे वक्त का गवाह बनके । "शैले,शैले ना मानिक्यम"..उसकी अपनी ही आवाज़ उसके कानों मे गूँज गयी...
ज़मीन पर डालियाँ टिका के खडे आम के पेड, वो छोटी,छोटी पग डंडियाँ ,आगे,आगे दौड़ने वाली वो और पीछे,पीछे दौड़ते दादाजी,नैहर की मिट्टी से मटमैले पैर, बरामदे मे झूलती कुर्सी पे बैठी ,कभी स्वेटर तो कभी लेस बुनती दादीमा,इन सब यादों को संजोये हुए ये उसका बचपन और जवानी का आशियाना.... उस से सदा के लिए जुदा होने जा रहा था....

सादी- सी लेकिन स्टार्च की हुई साडी पहने....जूडा बनाए हुए....हँसमुख माँ....कभी बगीचे मे रमने वाली तो कभी रसोयी मे....अपना दुःख कभी ना जताने वाली वो माता....उसके अस्तित्व से भरा हर कोना बिकने वाला था.... मानो, उसका बचपन बिक रहा हो....

खडे,खडे उसे उस बैग की याद आयी। भाईने वो लाकर देदी। क्या रखा होगा इसमे माने??देखा तो ऊपर ही एक पीला-सा हुआ ख़त पडा था..... ख़त खोलके वो पढने लगी....
माँ ने लिखा था,"मेरी बिटिया,इसमे मैंने तेरा और तेरी बिटिया का बचपन संजोके थाम के रखने की कोशिश की है... मेरे पास देने जैसा और तो कुछ भी नही... ये तुझे भी संजोना हो तो संजोना। मन मे एक तूफान-सा उठ रहा है...
chand लम्हें भर की नन्ही-सी जान को बाहों मे लिया था,कैसा प्यार उमड़ आया था! मातृत्व ऐसा होता है? पलभर मे दुनिया ही बदल देता है??कितनी दुआएं निकली थीं दिल से तेरे लिए,कैसी बहारों की तमन्ना की थी तेरे लिए,तेरे हिस्से के सारे गम,राहों के सारे कांटें मैंने माँग लिए थे.....

"धीरे,धीरे दिन गुजरते गए। मेरी आवाज़ सुनके तूने गर्दन घुमाना शुरू किया... तू मुस्काराने लगी,करवट लेने लगी... सब कुछ मनपे अंकित होता रहा...
सहारा लेके तेरा बैठना....मेरे हाथसे पहला कौर....उंगली पकड़ के लिया पहला क़द.....,मुहसे पहली बार निकला "माँ'!कितना संगीतमय था वो! घरके कोने,कोने से निकलती तेरी तेरी किलकारियाँ....स्कूल का पहला दिन... सहमा-सा तेरा चेहरा और नम होती मेरी ऑंखें,इसके अलावा भी और कितना कुछ!
"तू ब्याह के बाद ससुराल गयी तो हर कोनेसे "माँ"की गूँज सुनाई देती थी,लगता था,अभी किसी कोनेसे आके मेरे गलेमे बाँहें डालेगी, फ़ोन बजता तो दौड़ पड़ती, हरवक्त लगता,तेराही होगा!!
"आहिस्ता,आहिस्ता आदत पड़ गयी... फिर तेरी बिटियाके जनम ने एक नयी ख़ुशी,नया उल्लास जीवन मे भर दिया.... उसके लिए नयी,नयी चीज़े बनाने मे बड़ा aanand आता। जब तू उस नन्ही-सी जान को लेके मेरे पास आती....वो मुझ से लिपटती, तो एक अजीब-सा सुकून मिलता.... ब्याह के बाद वोभी ऑस्ट्रेलिया चली गयी तो जीवन का एक अध्याय मानो ख़त्म हो गया....
"अंत मे इतनाही कहूँगी कि ज़िंदगी मे जब कभी अँधेरा छा जाये,मन की ऑंखें खोल देना,उजाला अपने आप हो जाएगा....कोई राह हाथ पकड़ लेगी....कभी किसी दोराहे मे फंस के किसी मोड़ पे रूक मत जाना.... हमेशा धीरज रखना।अन्तिम सत्य के दर्शन ज़रूर होंगे....
हाँ!दुनिया मे नित्य कुछ भी नही....जीवन अनित्य से नित्य की ओर का एक सफ़र है। अगर भोर तुम्हारी मंज़िल है तो भोर से पहले उठ के सफ़र पे चल देना,तुम्हे मंज़िल ज़रूर मिल जायेगी। खैर !तुझे देखने के लिए आँखें हमेशा तरसती रहती हैं। मेरी लाडली,मेरा आर्शीवाद सदा तुम्हारे साथ रहेगा,सुखी रहना,खुश रहना।
तुम्हे बोहोत,बोहोत प्यार करने वाली तुम्हारी
माँ"

रिमझिम झरने वाले नयनों से,कांपते हाथों से,उसने बैग मे टटोल ना शुरू किया.... एक फाईल मे ,बचपन मे की हुई उसकी चित्रकला के पन्ने थे.... पीले पडे हुए...
एक नोटबुक थी जिसमे वो एक सुभाषित लिखा करती थी..... दूसरी नोटबुक मे उसने उसकी पसंद की तसवीरें ,ग्रीटिंग कार्ड्स आदि पर से काट के चिपकायी हुई थी.....
एक थैली मे उसकी स्कूल की प्रगती पुस्तकें थी.... स्कूल कालेज की पत्रिकाएँ, जिसमे उसके फोटो थे,लेख थे...
कुछ कपडे की potliyaa थीं,जिसमे छोटे ,छोटे, दुपट्टे थे....जिन्हे पहले तो वो स्वयम और बाद मे उसकी छुटकी बेटी गले मे डाल के घूमा करती थी....
छोटे,छोटे फ्रोक्स थे। कुछ उसके, कुछ उसकी बिटिया के थे.... जो माँने ही सिये थे... खतों का एक गट्ठा था... कुछ वो थे जो उसने समय,समय पर अपनी माँ को लिखे थे...... तो कुछ उसकी बिटियाने अपने नन्हें,नन्हे हाथों से अपनी नानी को लिखे थे....
एक लकड़ी का डिब्बा था.... उसमे अलग,अलग मेलोंसे कांच तथा पीतल के हार,छोटी,छोटी कांच की चूडिया,छल्ले और झुमके थे। कुछ कपडे की गुडियां थी, जो माँ ने पहले उसके लिए फिर उसकी बिटिया के लिए बनायी थी...
कुछ छोटे,छोटे खिलौनों के बरतन थे...
एक अल्बम थी... जिसमे उसके पलने मे की तस्वीरो के अलावा उसकी बिटिया के बचपन के फोटो भी थे... बोहोत देर तक वो वहाँ बैठी रही। फिर कब उठ खडी हुई उसे खुद पता नही चला।

छ: शयन कक्शोंवाला ,छ: स्नान गृह तथा तीन बैठकों वाला, बरामदों से घिरा हुआ वो घर था। वो उस मे घूमने लगी। यहाँ ,इस खिड्कीमे एक पुराना ग्रामोफोन हुआ करता था,तथा साथ,साथ रेकॉर्ड्स एक गट्ठा...
"घूंघट के पट खोल रे ,तोहे पिया मिलेंगे",ये सुर उसके कानोंमे गूँज ने लगे.... बचपन मे इन शब्दोंके मायने उसे पता नही चले थे। बाद मे समझ आयी,"घूंघट के पट "मतलब मानसपटल पे चढी अज्ञान की परतें.... उन्हें खोला जाय तो अन्तिम सत्य का दर्शन होगा.....
"कहो ना आस निरास भई",माँ हमेशा गुनगुनाया करती थी... फिर ना जाने कितने ही गाने कानों मे गूँज ने लगे,"ईचक दाना,बीचक दाना,दाना ऊपर दाना","नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी मे क्या है...."
इसी बीच किसी वक़्त उसने खाना खाया। शाम को फिर वो सारा परिसर आंखों मे ,मन मे बसाने निकल पडी। र्हिदय मे कुछ तार टूट से रहे थे....

दिलमे एक असीम दर्द लेके वो रातमे सोई। बड़ी देरसे नींद लगी। सुबह ट्रक आने लगे। उनकी आवाजों से वो जग गयी। सामान भरना शुरू हो गया था। देखते ही देखते घर खाली होने लगा। खाली घरमे आवाजें गूंजने लगी। उसकी ट्रेन का समय होने लगा था...
Bhaine कार निकाली.... उसने अपने नैहर पे एक आख़री नज़र डाली...
यहाँ एक दिन बुलडोज़र फिरेगा,जिन pedonkee टहनियों पे वो कभी खेली कूदी थी वो सब धराशायी हो जायेंगे... वहाँ सिमेंटके ब्लोक्स खडे हो जायेंगे....जो वास्तु उसके लिए इतने मायने रखती थी ,वही कितनी क्षणभंगुर बन रही थी.... कुछ भी तो चिरंतन नही इस धर्तीपर.... सच ही तो लिखा था माँ ने अपनी चिट्ठी मे... उसकी आंखें baar, बार छल छला रही थी...

वो कार मे बैठी...साथ माँ का दिया हुआ वो बैग भी था... कार स्टार्ट हुई। घर नज़र से ओझल होनेतक पीछे मुड़ कर वो देखती रही...
सच! सभी अनित्य है.... यही तो अन्तिम सच है। "घूंघट के पट खोल रे"बार बार ये धुन उसके मनमे बजती रही। स्टेशन आ गया। कुछ देरमे ट्रेन भी आ गयी.... आंसू भरे नयनों से उसने अपने भाई से विदा ली और ट्रेन मे चढ़ गयी....
जब ट्रेन चली तो उसके मन मे आया, अब दोबारा वो यहाँ कभी नही आ paayegee.... kisee वक़्त, कहीं और सफ़र करते समय, जब दो मिनट के लिए इस स्टेशन पे गाडी रुकेगी, तो वो खिड़की से jhaankegee...., मन मे ख़्याल aayegaa.... कभी यहाँ अपना नैहर हुआ करता था.... अनायास दूर जाते स्टेशन की ओर उसने हाथ हिलाया..... उस गाँव की बिटिया ने अपने नैहर से आखरी बिदा ली....
समाप्त.
प्रस्तुतकर्ता shama पर 10:18 AM
4 टिप्पणियाँ:

उन्मुक्त said...

इस कहानी का अगला भाग इसी पर मत लिखियेगा पर नयी चिट्ठी पर पोस्ट कीजिये। हिन्दी के फीड एग्रेगेटर की सूची यहां है। कईयों में आपको अपना चिट्टा रजिस्टर करवाना पड़ता है। देवनागरी चिट्ठे मेरा एग्रेगेटर है। यहां पर रजिस्टर करवाने की जरूरत नहीं। यदि अन्य में आपका चिट्ठा रजिस्टर नहीं है तो रजिस्टर करवायें। और लोगों के चिट्ठे पर भी टिप्पणी करें ताकी उन्हें भी आपके चिट्ठे के बारे में पता चल सके और वे आपकी कहानियों का आनन्द ले सकें। मेरा ईमेल यह है। यदि कुछ मुशकिल हो तो समपर्क करें।

7 comments:

परमजीत बाली said...

मार्मिक कहानी है।बहुत बढिया लिखी है।अच्छी लगी।

हिमांशु पाण्डेय said...

छमा कीजिएगा मैं पूरी कहानी नहीं पढ सका आखें भर आयी सचमुच मां एसी ही हॊती है। फिर भी उसका चारॊ ऒर निरादर देखने कॊ मिलता है बडे हॊने के बाद मां कितने साल तक साथ रह पाती है १० १५ २० साल। इतना समय भी हम उसे नहीं दे पाते जिसने अपना खून पिलाकर हमे बडा किया। शर्म आनी चाहिए उन कपूतॊ कॊ अपनी मां का प्रेम नहीं समझ पाते उनके दुख कॊ नहीं समझ पाते। मा कॊ कुछ नहीं चाहिए वह केवल अपनी संतान कॊ नजर भर के देखना चाहती है क्या आपके पास उसकी इस अंतिम इच्छा कॊ पूरी करने का समय नही यदि एसा है तॊ धिक्कार है एसी कमाइ पर एसी नॊकरी पर एसी जिन्दगी पर। आपने काफी भावुक करने वाली कहानी लिखी है। धन्यवाद

sandhyagupta said...

Bahut gehra asar choda aapki kahani ne..

वन्दना अवस्थी दुबे said...

रोमांचित करने वाली रचना. सचमुच नैहर तो केवल मां से ही होता है, और उस मां की कितनी इच्छायें हम पूरी कर पाते हैं?

गर्दूं-गाफिल said...

माँ तेरा आँचल कहाँ खो गया
तेरा लाडला अब तनहा हो गया

जीवन की दोपहरी में जलती रही
मेरे जीवन को उजला करती रही
उम्र की साँझ में जब अकेली हुई
थक कर भी मुझ पर निछावर रही
जिसकी गोदी में शीतल होता था मै
मेरी ममता का सागर कहाँ सो गया

नीड़ ममता का छोडा ,,छौना उड़ा
कौर जिसको खिलाये ,,सलोना मुड़ा
फिर भी देवालयों में ..बिसूरती रही
प्रार्थनाएं मेरे सुख की ही करती रही
जो लेकर बलैयां निखर जाता ..था
वो आरत का दीपक कहाँ खो गया

भावुक करने वाली कहानी

Pawan Kumar said...

सुन्दर कहानी है। आपने काफी भावुक करने वाली कहानी लिखी है।

ललितमोहन त्रिवेदी said...

नारी के मन में नैहर जीवनपर्यंत जुड़ा रहता है ! कहावत हैं बेटा विवाह होने तक बेटा रहता है पर बेटी आजीवन बेटी रहती है ,क्षरण होते जीवन मूल्यों में नैहर की याद सहेजे आपकी कहानी बड़े सहज भाव से पाठक के मन में उतर जाती है ! संस्मरण और कहानी में आपका चित्रण बहुत अच्छा है !