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Monday, July 6, 2009

याद आती रही....६

(पूर्व भाग: विनीताने शादी करने से मना कर दिया...बता दिया,कि, वो अपने काम में खुश है...अब अन्य किसी और चीज़ की चाहत नही...)

...और एक दिन अचानक माँ चल बसीं...!शायद उनसे विनीता का सदमा सहा न गया...दोपहर में खाना खाके लेटीं, तो बाद में उठीही नहीँ...

उनके जाने के बाद विनीता और बाबूजी बेहद उदास और तनहा हो गए...बाबूजी का तो मानो ज़िंदगी पर से विश्वास उठ-सा गया...अपनी छोटी बेटी की क़िस्मत में क्यों इतने दर्द लिखे हैं, उन्हें, समझ में नही आ रहा था..

अपनी सारी जायदाद उन्हों ने दोनों बेटियों के नाम कर दी...एक दिन विनीता ने अपने पिता से कहा,"क्यों न हम ये फ्लैट बेच के, कोई छोटा फ्लैट ले लें? फ्लैट बेच के जो रक़म आयेगी, उसे चाहे आप रखें, या दीदी को दे दें..इतना बड़ा घर माँ के बिना खाने को उठता है....और वैसे भी इस पड़ोस, इस मोहल्ले से दूर कहीँ, जाने का मन करता है..."

"ठीक है, बेटी, तुझे जो सही लगे, वैसा ही कर," बाबूजी ने उत्तर दिया...

विनीता ने उस लिहाज़ से क़दम उठाने शुरू कर दिए। उनका मौजूदा फ्लैट, निहायत अच्छी जगह स्थित था। उन्हें अच्छे ऑफ़र्स आने शुरू हो गए।

दूसरी ओर विनीता ने नया फ्लैट खोजना शुरू कर दिया...इस बारेमे, उसने अपनी विज्ञापन एजंसी के सह कर्मियों को भी कह रखा...क़िस्मत से वो काम भी बन गया...

बड़ा फ्लैट बिकने पर, बाबू जी ने उस रक़म में से आधे पैसे निशा को देने चाहे...लेकिन निशाने इनकार किया, बोली,"मै इन पैसों को आपके जीते जी छू भी नही सकती...आप इन्हें बैंक में रखें...फिक्स डिपॉजिट में रखें...उस पे जो ब्याज मिलेगा, आपके काम ही आयेगा...इस तरह बँटवारा करने की जल्द बाज़ी न करें..मेरे पास ईश्वर दिया सब कुछ है...अपना और विनीता ख्याल रखें...मुझे तो केवल ये दो चिंताएँ सताती रहती हैं...." बात करते, करते वो अपनी माँ को याद कर रो पडी...विनीता का दर्द वो खूब अच्छी तरह महसूस करती......

चंद दिनों में विनीता और उसके पिता नए फ्लैट में रहने चले गए....फ्लैट छोटा ज़रूर था, लेकिन, खुशनुमा, हवादार और रौशन था...पिता-पुत्री का मन धीरे, धीरे प्रसन्न रहने लगा...मायूसी का अँधेरा छंट ने लगा...बेटी को, गुनगुना ते, मुस्कुराते देख, पिता भी खुश हो गए...इसीतरह तीन साल बीत गए...

विनीता की दिनचर्या दिन-ब-दिन और ज़ियादा व्यस्त होती जा रही थी...बाबूजी रोज़ाना अपने हम उम्र दोस्तों के साथ घूमने निकल जाया करते...ऐसे ही एक शाम वो घूमने निकले और दिल के दौरे का शिकार हो गए...दोस्त उन्हें अस्पताल ले गए, लेकिन उनके प्राण उड़ चुके थे....

विनीता पे फिर एक बार वज्रपात हुआ...अभी तो ज़िन्दगी में कुछ खुशियाँ लौट रही थीं...वो फिर एकबार इस बेदर्द दुनियाँ में एकदम अकेली पड़ गयी...
निशा दीदी और कबीर आए..उन्हों ने विनीता को अपने साथ, कुछ रोज़, जबलपूर चलने की ज़िद की...उसके सहकर्मियों ने भी यही सलाह दी....कहा," चली जाओ, कुछ रोज़...ज़रूरी है..इस माहौल से बाहर निकलो...वरना, घुट के रह जाओगी..."

विनीता ने बात मान ली....लेकिन जब लौटी,तो घर का ताला खोल, अकेले ही अन्दर प्रवेश करना, उसे बेहद दर्द दे गया...वो ज़ारोज़ार रो दी....नौकर होते हुए भी, कई बार, बाबूजी अपने हाथों से व्यंजन बनाते...बड़े प्यार से उसे अपने सामने बिठाके खिलाते...

इधर, जब वो अपने दफ्तर लौटी, तो कुछ अजीब-सा माहौल उसका इंतज़ार कर रहा था...जिन सहकर्मियों ने उसे छुट्टी लेके जाने को कहा था...उसका काम सँभाल लेंगे, ये विश्वास दिलाया था, उन में से कोई भी उस के साथ,सीधे मुँह बात करने को तैयार नही था...! उसे माजरा समझ नही आया...बड़ी हैरान हो गयी...ये परिवर्तन क्यों ? किसलिए ? ऐसी क्या ख़ता हो गयी थी उससे, कि, उसके सहकरमी ,उसके साथ बात करना भी नही चाह रहे थे...!
वो अपने बॉस के चेंबर मे गयी....वहाँ मामला समझ मे आया....

क्रमश:

Wednesday, June 17, 2009

याद आती रही...३

(पूर्व भाग :विनीता अपनी यादों में खोयी हुई थी...)

विनय कई बार उसे खोयी-खोयी-सी पाता....उसे हँसाने की नयी, नयी तरकीबें सोचता रेहता। एक ओर विनीता पढाई के साथ साथ इधर उधर काम तलाशती रहती। उसकी चित्रकला बचपन से ही अच्छी थी। उसने विभिन्न पत्रिकाओं में अर्जियाँ भेज रखी थीं.....धीरे, धीरे उसे कथा/आलेख आदि सम्बंधित रेखा चित्र बनानेका काम मिलने लगा।

इसी दरमियान उन्हें एक पेइंग गेस्ट भी मिल गया। उसका परिवार चाह रहा था,कि, कोई लडकी मिले, लेकिन अंतमे कबीर नामक,एक वनस्पति शास्त्र का अध्यापक मिला। लड़के का परिवार जबलपूर में स्थित था। वो शादीशुदा नही था। उसकी तक़रीबन सारी पढाई मुम्बई में ही हुई थी।

एक दिन विनीता को विनय उसके कॉलेज से घर ले जा रहा था। अचानक किसी साडी के बड़े-से शो रूम के सामने उसने गाडी पार्क कर दी। विनीता ने हैरत से पूछा," यहाँ क्यों रोक ली कार? कुछ काम है क्या?"
" हाँ, है...! चलो मेरे साथ....,"उसने विनीता से आग्रह किया।
विनीता उतरी और उसके पीछे उस दुकान में चली गयी। विनय ने शो केस में लटकी हुई, दो, बड़ी ही कीमती साडियाँ, सेल्समन को कह उतरवा लीं...एक लाल, दूसरी काली। वहीँ खड़े,खड़े, सभी के सामने , उसने लाल साडी को खोला.....विनीता के सर परसे उसे डालते हुए बोल पडा,"ये साडी जब तुम पहनोगी, तो, तुम पे कितनी जंचेगी.......!"
तुंरत ही काली साडी उठाके बोला," तय नही कर पा रहा,कि, ये अधिक सुंदर लगेगी या लाल!"

विनीता को पूरी दूकान घूर रही थी...!और वो लाज के मारे चूर, चूर हुई जा रही थी...!उसने सेल्समन से कहा,"हम दोबारा आएँगे...", और दौड़ ते हुए दुकान के बाहर निकल पडी...विनय भी उसके पीछे दौडा। विनीता शर्म के मारे विनय से आँख मिला नही पा रही थी...

जब दोनों कार में बैठे,तो विनय उससे बोला," विनीता, मेरी तरफ़ देखो तो सही! कितनी सुंदर लग रही हो ! जब मेरी दुल्हन बनोगी तो कैसी लगोगी....! मै भी कितना बेवक़ूफ़ हूँ...! तुमसे ना तो कहा, कि, तुमसे प्यार करता हूँ, न तो पूछा, कि, मुझसे शादी करोगी? अगर अभी पूछूँ तो?"

"हाँ, विनय," कहते हुए विनीता ने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा लिया...इस वक़्त उसके ज़ेहेन से सारे चित्र, सारे रेखांकन हट गए...एक सुनहरा भविष्य सामने आ खडा हुआ....जहाँ वो थी, विनय था, और उनकी छोटी-सी दुनियाँ...!ये कब हुआ,उसे पताभी न चला...!

फिर दोनों ने अपने अपने घर वालों को अपना इरादा बताया। किसी को वैसे कोई आपत्ती नही थी। कुछ ही महीनों में दोनों की पढाई पूरी हो गयी।
विनय के पिता ने, विनीता के पिता को अलग से बुला के कहा," अभी विनय की उम्र शादी के लिहाज़ से कम है....मै चाहता हूँ, कि, ये लन्दन जाके बारिस्टर बने। वैसे चाहता तो विनय भी यही है...और केवल एल.एल.बी.में रखाही क्या है?मेरी भी तो वहीँ पे पढाई हुई थी...."

जब विनीता के कानों तक ये बात पोहोंची, तो वो बेहद उदास हो गयी...साथ ही में उसे गुस्सा भी आया...यही बात विनय भी तो उसे बता सकता था ! विनय के पिता को, उसके पिता से कहने वाली कौनसी बात थी ...?

जब वो दोनों मिले,तो विनीता ने अपने मनकी बात साफ़-साफ़ विनय से कह दी....विनय बोला," हाँ! तुम ठीक कहती हो...इससे पहले,कि, मै ठीक से निर्णय ले पाऊँ, मेरे पापा ने ने तुम्हारे पापा से बात कर ली..."

"विनय, क्या आगे की पढाई के लिए लन्दन ही जाना ज़रूरी है? तुम हिन्दुस्तान में रह के भी तो आगे की पढाई कर सकते हो....! अन्य लोग भी तो करते ही हैं...!"विनीता रुआं-सी होके बोली...

विनय ने उसका हाथ थामते हुए कहा," विनी, समय पँख लगा के उड़ जायेगा...! जो मायने वहाँ की डिग्री रखती है, वो यहाँ की नहीँ...!हमारा प्यार पत्थर की लकीर है...मेरे परिवार ने तुम्हें अपनी अपनी बहू मान ही लिया है ! ऐसी सुंदर बहू से किसे इनकार हो सकता है?" विनय ने थोड़ी-सी शरारत करते हुए, विनीता के होटों पे मुस्कान लाने का असफल प्रयास किया ।

विनय को लन्दन में दाखिला मिल गया। उसकी जाने की तैय्यारियाँ शुरू हो गयीं....इधर विनीता का दिल डूबता रहा...और फिर वो दिन भी आ गया जब, विनय के प्लेन ने उड़ान भर ली...
विनय का पूरा परिवार हवाई अड्डे पे जानेवाला था...इसलिए विनीता नही गयी, लेकिन उसे किसी ने इसरार भी तो नही किया...उसके संवेदनशील मन को ये बात बेहद खटकी...विनय ने तो कहा था, उसके परिवार ने विनीता को अपनी बहू के रूप में स्वीकार कर लिया है, फिर भी उसे साथ चलने के लिए किसे ने नही कहा? विनय तक ने आग्रह नही किया?

विनय जिस दिन जानेवाला था, उसकी पूर्व संध्या को दोनों समंदर के किनारे घूमने गए। विनय ने खतों द्वारा, फोन द्वारा सतत संपर्क बनाये रखने का वादा किया, पर विनीता की आँखें बार, बार भर आतीं रहीँ ...उसे ना जाने क्यों महसूस होता रहा,कि, विनय ने उसे अव्वल तो सब्ज़ बाग़ दिखाए और फिर किसी रेगिस्तान में ,अकेले ही अपनी राह ख़ुद खोज ने के लिए छोड़ चला....
क्या प्यार में औरत अधिक भावुक होती है? उसके लिए विनय अब सब कुछ हो गया था, लेकिन विनय के लिए वो सब कुछ नही थी...!

दुकान में ले जाके , उसपे साडी डाल ने वाले विनय का रूप कितना अधिक मोहक था...वहाँ भी उससे बिना बताये उसने कुछ किया था...और यहाँ भी....लेकिन ये रूप कितना दुःख दाई था...! काश ! इस वक़्त विनय ने उसे विश्वास में लेके मानसिक रूप से तैयार किया होता ! इस अचानक बिरह को विनीता का मन स्वीकार ही नही कर पा रहा था....वो बेहद व्याकुल हो उठी थी....उसे लग रहा था, मानो, विनय उसकी मन: स्थिती समझ ही ना रहा हो....! खैर !
विनय चला गया....

क्रमश:

Tuesday, June 2, 2009

याद आती रही....२

( पूर्व भाग, जहाँ, क्रम छोडा था:" विनय और विनीता का परिवार पड़ोसी हुआ करते थे...")

दोनों बचपनमे एक ही स्कूल में पढा करते...लेकिन कथा, कहानियों या, फिल्मों की तरह, इन दोनों का प्यार बचपन में नही पनपा...दोस्ती थी, जैसे किसी भी अन्य वर्ग मित्र या दोस्त से होती है...उसके अलावा कुछ नही...कभी कबार स्कूल इकट्ठे चले जाते, पर साथ में कोई घरका बड़ा चलता...और फिर महाविद्यालय के दिन आए तो, अलगाव होही गया.....विनीता ने फाइन आर्ट्स में प्रवेश लिया और विनय ने बारहवी कक्षा के बाद law कॉलेज में दाखिला ले लिया। उसके पिता ख़ुद एक नामी वकील थे....ये बात तो शायद सभी जानते थे, कि, उन्हें पैसों के आगे और कुछ नज़र नही आता। नैतिकता का गर कोई माप दंड हो तो, उसपे वे कभी खरे उतर नही सकते...!

खैर ! महाविद्यालय बदल जानेके बाद इन दोनों की मुलाकातें बंद ही हो गयीं....दोनों परिवारों के बीच वैसेभी कभी ख़ास मेल मिलाप नही था...

और फिर विनीता को अनायास याद आ गयी वो एक बरसाती संध्या...मुंबई की धुआँ धार बरसात में ,वो किसी तरह, एक छाता सँभाले, सिमटी-सी फुट पाथ परसे चल रही थी... तेज़ हवाओं ने अव्वल तो उसका छाता उलटा कर दिया और फिर उड़ा ही दिया..!वो वहीँ ठिठक, उस उड़ते छाते को देखती जा रही थी...तभी पीछे से एक गाडी, हार्न बजाते हुए, फुट पाथ के क़रीब आके रुकी....मुड के जो देखा, उसमे विनय था..!

खिड़की ज़रा-सी नीचे कर, विनय ने विनीता को कार में बैठ ने का इशारा किया....विनीता कारके पास आयी तो बोला," आओ, बैठो...घरही लौट रही हो ना? मै छोड़ देता हूँ...मैभी घरही जा रहा हूँ....",कहते हुए उसने विनीता के लिए साथ वाली सीट का दरवाजा खोल दिया.....
पल भर विनीता सकुचाई...वो पानी से तर थी...कार की क़ीमती सीट देख, उसे अन्दर बैठ जानेमे हिच किचाहट-सी हुई...विनय ने भाँप लिया..बोला," उफ्फो ! बैठो तो...! किस औपचारिकता मे पडी हो...? चलो, चलो, भीगती खड़ी हो...कार की सीट सूख जायेगी, लेकिन तुम और भीगी तो बीमार ज़रूर पडोगी...! अरे बैठो भी...!"

विनीता सिमटी सिमटी-सी कार में बैठ गयी...विनय ने गाडी को आगे बढाते हुए कहा," कैसी पागल हो? टैक्सी क्यों नही कर ली? ऐसी बरसात में पैदल चलनेका क्या मतलब हुआ?", पूरा हक़ जताते हुए, विनय उसके साथ बतियाने लगा....मानो बीच के, तक़रीबन २ से अधिक गुज़रें सालों का फ़ासला पलमे ख़त्म हो गया हो...!जिन दो सालों में वो दोनों एक बार भी नही मिले थे.....!

न जाने क्यों, विनीता को उसका इस तरह से हक़ जताना अच्छा लगा...कुछ खामोशी के बाद वो बोली," विनय...हम काफ़ी अरसेके बाद मिल रहें हैं....तुम्हें मेरे घरके हालात का शायद कुछ भी अंदाज़ा नही...मेरे पिताजी के जाली हस्ताक्षर बना के, उन्हें लाखों का नुकसान पोंह्चाया गया ...उनके बिज़नेस पार्टनर ने भी उसी समय उनका साथ छोड़ दिया...पता नही, मेरी और निशा दीदी की पढाई का खर्च कैसे चल रहा है...माँ से तो पूछते हुए भी डर लगता है...माँ ने कहीँ अलग से कुछ बचत कर रखी हो तभी ये मुमकिन हो सकता है..."

बात करते, करते विनीता रुक गयी...उसे ये सब बताते हुए, फिर एकबार, बड़ा संकोच महसूस हुआ...अजीब-सी कश्म कश...के घरके हालात किसी अन्य को बताना ठीक है या नही....? उनकी चर्चा करना अपने माता-पिता की कहीँ तौहीन तो नही? वो दोनों ही बेहद खुद्दार हैं...

" कितनी हैरानी की बात है.....हम लोग इतने क़रीब रहते हैं, लेकिन कुछ ख़बर नही....ना ही तुमने कभी बताने की कोशिश की....कैसे बचपन के दोस्त निकले हम? कैसे पड़ोसी?" विनय के सूर मे एक उद्वेग छलक रहा था...

"विनय, ऐसी कोई बात नही...बारह वी कक्षा के बाद अपना मेलजोल तो ख़त्म ही हो गया था...कभी सड़क चलते भी मुलाक़ात नही हुई...आज अचानक, किसी दुमतारे की तरह उभरकर तुम सामने आ गए....पूछा तो बता रही हूँ...वरना अलगसे सिर्फ़ यही दुखडा रोने मै क्या मिलती तुमसे? अव्वल तो ये बात कभी मेरे दिमाग मे भी नही आयी....और चाहे कितना भी कड़वा सच हो, इन हालातों से हमें ही झूजना होगा....
"फिलहाल, जो हमारा तीसरा बेडरूम है, उसे हम पेइंग गेस्ट की हैसियत से देने की सोच रहे हैं..चंद परिचितों को कहके रखा है....गर कोई किरायेदार मिल जाता है तो कुछ सहारा तो होही जायेगा...", विनीता रुक रुक के विनय को बताये जा रही थी...

इन बातों के चलते, चलते उनकी सोसायटी भी आ गयी...कार के रुकते ही विनीता दौड़ के अन्दर भाग पडी...लेकिन उस रोज़ के बाद उन दोनों की मुलाकातें बढ़ने लगीं....और अब उन मुलाकातों मे बचपना नही था....ज़रा-सा कुछ और था...जो दोनों भी समझ रहे थे....विनीता को उसके अपने हालातों ने बेहद परिपक्व बना दिया था...वैसेभी संजीदगी तो उन दोनों बहनों मे हमेशासे थी....अपनी पढाई ख़त्म होतेही वो किसी न किसी काम पे लग जाना चाह रही थी....

क्रमश:

Friday, April 3, 2009

नीले ,पीले फूल. ( कहानी)

नीले पीले फूल ( कहानी)

भई, अबके गर्मियों की छुट्टियों मे हिंदुस्तान मेही कहीं चलेंगे। परदेस चलने का कुछ मूड नहीं बन रहा!"सुबह
बाथरूम मे खड़ा विपुल शेव करते करते अपनी पत्नी नीरा से बतियाने लगा। कुछ देर उसकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर फिर आगे बोल पडा ,"सोंचता हूँ,पहले तो शिमला चल पड़ें ,फिर आगे की देखी जायेगी। वैसे तो घिसी पिटी जगह है, गर्मियों मे भीड़ भी रहेगी ,लेकिन बच्चे भी तो बेरौनक जगह जाना नही चाहते ना अब!"

विपुल बिना नीरा की ओर देखे बोला चला जा रहा था। अगर देख लेता तो शायद बड़ा चकित हो जाता। हिमाचल की उस राजधानी का नाम सुनते ही नीरा ऎसी कंपित हो उठी , जैसे किसी हिमशिखा से चला सर्द हवा का झोंका उसे छू गया हो! उस के मन का एक मूर्छित सोया कोना हज़ारों झंकारों के साथ जाग उठा। पिछली शाम dryclean हो आयी साडीयां अलमारी मे लटकाती नीरा एकदम रूक सी गयी, मानो उस की किसीभी हलचल से विपुल अपना विचार बदल ना दे। नीरा के इस बर्ताव के पीछे एक रहस्य था,जो दबा पडा एक किताब के पन्नोमे,और वो किताब पडी हुई थी उसी अलमारी मे,पिछले कयी वर्षों से।

"भई!कुछ बोलो भी!!क्या सरकार को हमारा ख़्याल पसंद नही आया?अगर नही तो तुम जहाँ कहोगी वहीं चलेंगे, परदेस ही कही चलना है तो ....."

"नही,नही,ऎसी बात नही!!मैं तो बस किसी सोंच में उलझ गयी थी......अबकी बार वाकई शिमला ही चलेंगे,"नीराने अपने आप पे काबू पाते हुए कहा। लेकिन फिरभी उस का अन्तिम वाक्य गौर से सुन ने वाले को लगता जैसे अर्धस्पप्नावस्था मे कहा गया हो। विपुल का घ्यान नही था। शेव ख़त्म होतेही ही उसने नहाने के लिए बाथरूम का दरवाजा बंद कर लिया।

बच्चे तो सुबह ही स्कूल चले गए थे। नाश्ता करके विपुल भी जब ऑफिस चला गया तो नीरा ने अपनी अलमारी खोली। उसमे से वो किताब निकाली और खोला वो पन्ना जहाँ चंद सूख नीले,पीले फूल चिपके हुए थे उसने उन्हें धीरेसे छुआ और अनायास बोल पडी ,"उसका पता मैं लगा पाऊँगी?"

खडी ,खडी ही नीरा अतीत मे खो गयी। बीस साल पहले अपने माँ-बाबूजी के साथ वो शिमला गयी थी। केवल चौदह वर्षीया लडकी थी तब नीरा।
"होटल हिमाचल"मे रुके थे वे लोग। साफ सुथरा,बड़ी ही सुन्दर जगह स्थित होटल था वो। वहाँ एक अठारह,उन्नीस साल का वेटर काम करता था। ख़ूब हंसमुख,लेकिन उतनाही सभ्य और बेहद फूर्तीला। बाबूजी तो उसपर एकदम लट्टू हो गए थे। सुबह और रात मे तो वो नज़र आता था dining हाल मे लेकिन दिनके समय नही। एक दिन बाबूजीने पूछ ही लिया,"भई तुम दिन मे नही नज़र आते?सिर्फ सुबह और रातमेही काम करते हो क्या?"

"जीं,दिन मे मैं कालेज जाता हूँ। "
"अच्छा? क्या पढ़ते हो?" बाबूजी ने पूछा।
मैं m.b.b.s के फर्स्ट year मे हूँ। "वो बोला।
"वाह,भई वाह!!बडे होनहार हो!! लेकिन बुरा ना मानो तो एक बात पूछूं बेटा?" बाबूजी ने बडे प्यारसे कहा।
"जीं,बिलकुल पूछिए,"उसने नम्रता से जवाब दिया।
"बेटा तुम्हारे घरमे और कोई कमाने वाला नही है क्या?मेरा मतलब है,वैसे तो खुद कमाना और पढना अच्छी बात है। आत्मसम्मान बना रहता है,लेकिन मेडिसिन की पढाई कुछ अधिक होती है ना इसलिये पूछ रहा हूँ," बाबूजी बोले।
"बाबूजी, दरअसल मेरे पिताका कुछ साल पहले बीमारी से देहांत हो गया । हम लोग रहनेवाले देहरादून के थे। पिताजी का वहाँ छोटा सा कारोबार था। माँ तो मेरे बचपन मे ही चल बसीं थीं। मैं अकेली ही संतान था। मेरे पिताजी का अपने छोटे भाई पर बड़ा विश्वास था। मरने से पहले अपना सारा कारोबार पितीजी ने उन्हें सौप दिया। सोंचा,चाचाजी कारोबार के पैसों से मुझे पढा देंगे और बादमे यथासमय कारोबार मेरे हवाले कर देंगे। लेकिन चाचाजी ने सब हड़प लिया। घर मे मुझे बड़ा तंग करने लगे। मैं अपनी पढाई हरगिज़ नही छोड़ना चाहता था। घर छोड़ काम की तलाश मे यहाँ चला आया। इस होटल मे काम करते हुए पढने लगा।
"दरअसल, इस होटल के जो मालिक है ना, बडेही भले आदमी है। उन्हों नेही पहले तो स्कूल मे, फिर मेडिकल कालेज मे दाखिला कराया। उनकी ऑलाद नही है। अकेले ही रहते है। कहते है, पढाई का पूरा खर्चा वोही देंगे। मुझे तो काम करे से भी रोकते हैं,पर मेरा मन नही मानता। सुबह एक डेढ़ घंटा तथा रात मे एक डेढ़ घंटा काम कर लेता हूँ। "
कुतूहल और प्रशंसा से नीरा भी सब कुछ सुन रही थी। वाकई कितना नेक और सरल,सच्चा इन्सान है ये! होटल के मालिक के प्रती भी उस का मन श्रद्घा से भर आया।
"शाबाश बेटे,शाबाश! बोहोत ख़ूब!!अच्छा बताओ तुम्हारा नाम क्या है?"बाबूजी ने पूछा।
"नाम तो मेरा निरंजन है,वैसे सब मुझे राजू ही कहते है।" निरंजन ने बताया।
जब निरंजन वहाँ से हट गया तो माँ ने भी कह दिया,"बड़ाही होनहार लड़का है! भगवान् इसे सफलता दे और होटल के मालिक को लम्बी उम्र!!"

एक दिन सुबह होटल के लॉन के एक कोनेमे नीरा को कुछ घाँस के फूल दिखाई दिए....... बडेही सुन्दर,कोमल। उसने धूप सेकते बैठे बाबूजी से चिहुक के कहा,"बाबूजी! देखिए तो! कितने सुन्दर फूल है ये!!"
इन्हें तोड़ कर अपनी किसी किताब मे रख लेना। ये एक यादगार बन जायेंगे,"बाबूजी बोले।
"आज नही। जिस दिन चंडीगढ़ के लिए वापस चलेंगे ना, उस दिन मैं इन्हें किताब मे दबा कर रख लूँगी",नीरा ने कहा था।

जिस दिन चलने लगे उस दिन नीरा उन फूलोंके बारेमे भूल ही गयी। माँ टैक्सी मे समान रखवा रहीँ थीं ,बाबूजी होटल का बिल अदा कर रहे थे,नीरा ,कुछ भूला तो नही ,ये देखने के लिए अपने कमरे के ओर बढ़ी तो दरवाज़ेपर वही घाँस के फूल लिए निरंजन खङा था....
"उस दिन आप अपने बाबूजी से कह रही थी ना,ये फूल बडे सुन्दर हैं,"कहते हुए उसने उन घाँस के फूलोंका छोटासा गुच्छा नीरा की ओर बढाया।
चकित ,भरमायी -सी नीराने आँखें उठाके उसे देखा तो पाया, कि वो बेहद उदास निगाहोंसे उसे अपलक देख रहा था। एक अबीब-सी , अजनबी संवेदना उसके अन्दर तक दौड़ गयी, जिसका उस समय उसका अबोध किशोर मन नामकरण नही कर पाया। महसूस हुई कान और गालों पर एक अनोंखी गरमी। उसने निरंजन के हाथोंसे फूल लिए और शरमा कर टैक्सी की ओर चल दी । निरंजन उसके पीछे आया । तब तक बिल अदा करके बाबूजी भी वहाँ पोहोच चुके थे।

नीरा के हाथ मे फूल देखे तो बोले,"अरे फूल इक्ट्ठे कर रही थी हमारी बिटिया!"
जी ,!"इस से आगे नीरा कुछ बोल नही पायी।
माँ बाबूजी ने निरंजन की ओर मुखातिब हो उसे जी भर के शुभ कामनाएँ दीं। निरंजन ने हाथ जोडे और टैक्सी चलने के पहले ही तेज़ कदमों से अन्दर मुड़ गया। नीरा समझ नही पायी कि, क्या उसकी आँखों मे उन वादियों के कोहरे की नमी थी...?

चंडीगढ़ से जब वे लोग शिमला की ओर चले थे पूरा रास्ता नीरा चिड़िया की तरह चिहुकती आयी थी। लॉटते हुए उसे उस अर्ध क्षण की अनुभूती ने कितना अंतर्मुखी बना दिया था!

घर पहुँचते ही नारा ने उन फूलोंको अपनी एक किताब मे दबा दिया। देखते ही देखते वर्ष बीत ते गए। उन गर्मियों के बाद उस परिवार का कभी दोबारा शिमला जाना ही नही हुआ। उन्नीस वर्ष की पूरी होते,होते नीरा की विपुल से शादी भी हो गयी।
विपुल के पास धन दौलत की विपुलता तो थीही , उसने नीरा लो चाहा भी बेहद। वैसे स्वभावत: वो बड़ा हँसमुख और बातूनी था।
एक दिन उसने नीरा को कहा था,"तुम जब भी बाहर निकला करो ना, तब धूप का काला चश्मा आंखों पे लगा लिया करो"।
"क्यों",नीरा ने हैरत से पूछा था।
"पता नही,मेरी तरह कौन,कौन बेचारे इन इनकी गिरफ्त मे आकर घायल होते होंगे?"विपुलने छेड़ा।
"अच्छा??जैसे लोगों को मेरी आँखों मे झांक ने के अलावा दूसरा कोई काम ही नही!"नीरा ने कहा था।
"अजी,हम भी उन्ही निकम्मों मे से एक हैं,क्या भूल गईँ?तुम जब चंडीगढ़ से अपने चाचा के पास आयी थी तो canaught प्लेस मे हमने तुम्हे देख लिया था, और ऐसा पीछा किया, ज़िंदगी भर छूटेगा नही,"विपुल ने शरारत से याद दिलाया था।
लेकिन इतना भरा पूरा घर-संसार होते हुए भी नीरा के मन का एक कोना बिलकुल सूना ,अछूता रह गया था। एक सुनसान,अंधेरी गूफा की तरह।

ना जाने नीरा कितनी देर खयालों मे खोयी रही। जब गर्मियों की छुट्टियों की जब तैयारियां होने लगी तो नीरा मे एक अजीब सी चेतना भर गयी। लड़कपन की अधीरता से वो शिमला जानेका इंतज़ार करने लगी। इतना उल्लसित उसे उसके परिवालों ने शायद ही कभी देखा था।
"अपनी ही कार से चलेंगे!",उसने विपुल से आग्रह किया।
विपुल ने मान भी लिया।

सारा रास्ता नीरा खयालों मे खोयी रही । क्या निरंजन का पता मिलेगा??क्या वो शिमला मे ही होगा?बाबूजी से तो उसने एक दिन यही कहा था डाक्टर बन के वो शिमला मेही काम करेगा। लेकिन ज़िंदगी का क्या भरोसा?किस वक़्त किस मोड़ पर ले जाये?उसने विवाह भी कर लिया होगा!!लेकिन कर भी लिया हो तो क्या??उसके अतीत के वो कुछ पल जो नितांत उसके अपने थे, उसमे तो किसी की साझेदारी नही हो सकती!केवल उसने उन पलोंको जिया है,और किसी ने तो नही!उन पलोंकी स्मुतियों को उजागर करनेकी चाह मन और जीवन की सारी सीमा रेखाओं को पार कर उसे व्याकुल,अधीर बनाती रही।

शिमला पहुँचने के दुसरे ही दिन उसने दिन विपुल तथा बच्चों से कहा,"भयी,आज मैं अकेलेही शिमला मे कुछ देर घूमूँगी, खुद ही ड्राइव भी करूँगी । "
विपुल हैरानी उसे देखता रहा,बोला,"अकेली? क्यों?और खुद ही ड्राइव भी करोगी?तुम देहली मे तो इतना डरती हो कार चलाने से और यहाँ ड्राइव करोगी??इन अनजान पहाड़ी रास्तोंपे??
"बस ऐसे ही मन कर रहा है.बोहोत साल पेहेले माँ-बाबूजी के साथ यहाँ आयी थी। उन्ही यादोंको अकेले उजागर करना चाहती हूँ",नीरा ना चाहते हुए भी कुछ खोयी-सी बोली।
ओहो??ऎसी कौनसी यादें हैं जो हम नही बाँट सकते ?और फिर होटलकी भी कार सर्विस है,उससे जाओ। गाडी मत चलाओ। आख़िर किसलिये रिस्क लेना चाहती हो?" विपुल ने हर तरह से उसे रोकना चाहा, लेकिन नीरा के साथ हर बेहेस बेअसर थी। बच्चे भी माँ के इस बदले हुए रुप को हैरत से देखते रहे, बोले कुछ भी नही। विपुल ने हार के कार की चाभियाँ नीरा को पकडा दीं और हताश हो कमरेमे बैठ गया।
नीरा ने होटल से रोड़ मैप ले लिया और "होटल हिमाचल"की ओर चल दीं। एक अनाम धुन मे सवार,कहीं कोई अपराध बोध नही। केवल एक आत्यंतिक उत्कंठा। क्या निरंजन को वो तलाश पायेगी??

"होटल हिमाचल"पोहोंच के उसने कार पार्क की। होटल का हूलीया काफी बदला हुआ नज़र आ रहा था। पहले कितना साफ सुथरा हुआ करता था ये होटल!
काउंटर पर पोहोच कर उसने मेनेजर से कहा, 'देखिए मैं यहाँ किसी का पता पूछने आयी हूँ, कुछ बीस साल पहले हम यहाँ एक बार आये थे तब...."
"बीस साल पहले?पिछले दस सालोंसे मैं यहाँ मेनेजर हूँ। किसका पता चाहती हैं आप?"मेनेजर ने उसकी बात काट ते हुए उस से प्रतिप्रश्न किया।
"ओह! क्या इस होटल के मालिक से मिल सकती हूँ मैं?"नीरा ने बड़ी आशा से पूछा।
"इस होटल के जो पुराने मलिक थे,देहांत हो गया,कुछ सात साल पहेले। नए मालिक तो...."
हे भगवान्!पुराने मालिक का देहांत हो गया?"नीरा एकदम हताश हो उठी। अब कौन उसे निरंजन का पता बतायेगा??
उसकी निराशा देख,मेनेजर ने उस से कहा,"देखिए,इस होटल के जो पुराने मालिक थे,सुना है उन्होने एक वेटर को बिलकूल अपने बेटे की तरह रखा था, शायद वो आपकी ......"
"कहाँ है वो? क्या करता है?शिमला मे ही है?क्या आप मुझे उसका पता बता पायेंगे?"नीरा का खोया उल्लास लॉट आया और उसने सवालों की बौछार कर दीं।
"वो आजकल शिमला मे ही है, काफी जाना माना डाक्टर है,डाक्टर निरंजन्कुमार। पुराने मालिक ने पढाई के लिए उसे परदेस भी भेजा था,और उन्होनेही अस्पताल भी खुलवा दिया। "

मेनेजर जैसे,जैसे बताता गया,नीरा का चेहरा खुशी से खिलता गया। निरंजन के अस्पताल का पता जान ने के लिए वो बेताब हो उठी।
मनेजर ने एक कागज पे उसे रास्ते समझाते हुए पता लिख दिया.... नीरा ने बे-सब्रीसे उसके हाथ से कागज छीना अपनी कार की ओर तेज़ीसे दौड़ पडी,ख़ुशी और उत्कंठा से उसका शरीर काँप सा रहा था....
ये ऎसी उत्कंठा,ऐसा अछूता,अनूठा कंपन उसके लिए तकरीबन अपरिचित ही था। जिस व्यक्ती को उसने वर्षों पहेले केवल एकही बार देखा था,क्या वो ऎसी विलक्षण संवेदना जगह सकता है??नीरा को अपने आप पे अचरज हो रहा था.....

अस्पताल होटल से ज़्यादा दूर नही था। पता ढूँढने मे नीरा को खास परेशानी नही हुई। गेट के अन्दर घुसते ही उसने देखा कि छोटा-सा लेकिन काफी साफ सुथरा था अस्पताल। मुख्य द्वार से अन्दर जाते ही सामने बैठी receptionist ने उसे एक कार्ड थमाया, जिस पे नीरा ने काँपते हाथों से अपना नाम लिखा और वापस किया...

हॉल मे कुछ और लोग भी बैठे हुए थे। नीरा एक कुर्सी पर जा बैठी। इतना उत्कंठा भरा इंतज़ार तो नवपरिणीता नीरा ने सुहाग रात के दिन अपने पती का भी नही किया था। आज उसे वो व्यक्ती दिखने वाला था,जिसे इतने वर्षों मे वो कभी भी नही भूली थी। नीरा को देखते ही वो अनायास कह उठेगा,"अरे आप!!इतने सालों बाद?"
"पहचाना मुझे?" काँपते होंटों से कुछ अलफ़ाज़ फिसल पड़ेंगे। इस पर निरंजन का क्या जवाब रहेगा?

अचानक उसका नाम पुकारा गया। दरवाजा खोल कर अन्दर जाने तक उसका मुँह सूख गया.... शरीर पसीने से लथपथ..... सामने वही निरंजन था।
नीरा मूर्तिवत खडी उसे देखती रही...
"आयिये , बैठिये !!"किसी व्यावसायिक डाक्टर की सभ्यता से निरंजन ने उस से कहा।
"हे भगवान्!!इसने लगता है,मुझे पहचाना ही नही!,"निरंजन उसे पहचानेगा नही, इस संभावना का तो उसने अनुमान ही नही किया था..... वो जड़वत कुर्सी पे बैठ गयी.....
"कहिये क्या तकलीफ है आप को?"डाक्टर उसे पूछ रहा था।
"जी .....तकलीफ......नही....मुझे....मैं..."
नीरा की समझ मे नही आ रहा था कि उस से कैसे पूछे,कैसे बताये??
"हाँ,हाँ,कहिये!!आप कुछ परेशान-सी लग रही हैं। आपके साथ औरभी कोई है या आप अकेली आयी हैं?"निरंजन उस से पूछ रहा था।
जी नही...मेरा मतलब है,जी हाँ.......होटल मे हैं......मेरे पती और बच्चे.... मैं आपके अस्पताल मे अकेली आयी हूँ। मैं पूछना चाह रही थी कि आप "होटल हिमाचल"जानते हैं?"नीरा ने पूछने की कोशिश की।
"क्या आप वहाँ रुकी हैं? वहाँ पर कोई बीमार है?मतलब आप मुझे visit पे बुलाने आयीं हैं?"
"नही,नही, मैं वहाँ नही रुकी हूँ। विजिट पे भी नही बुलाना चाहती। मैं तो .....क्या उस होटल के पुराने मालिक को...कभी....आप...जानते थे??"
नीरा की खुद समझ नही आ रहा था कि वो क्या बोल रही है......
"क्या आप उनके बारेमे जानना चाहती हैं?अफ़सोस!वो अब इस दुनिया मे नही रहे। कुछ सात साल पहेले उनका निधन हो गया," डॉक्टर निरंजन ने बताया।
"जी ...वो तो मैंने भी सुना। लेकिन...लेकिन...अबसे बीस साल पहेले हम उस होटल मे रुके थे। मतलब मैं और मेरे माँ-बाबूजी। उस समय वहाँ पे एक........."
अब नीरा बेहद व्याकुल हो उठी। उसके कतई समझ मे नही आ रहा था वो उस डाक्टर से कैसे पूछे क्या कि क्या वो वही राजू है?
अंत मे उसने पर्स मेसे वो लिफाफा निकाला, जिसमे वो घाँस के नीले, पीले फूल रख कर साथ लाई थी। धीरे से उन फूलोंको निरंजन के सामने रखते हुए उसने पूछा,"क्या आप इन फूलोंको पहचानते हैं?क्या आपने ये फूल कभी किसीको .. ....",इसके आगे उस से बोला नही गया....

"ये क्या फूल हैं?शायद आप किसीकी तलाश मे यहाँ आयीं है!!कुछ गलत फेहेमी तो नही हुई आपको?"निरंजन ने बडे ही शांत भाव से कहा। नीरा को सारी दुनिया घूमती हुई-सी नज़र आने लगी।
"क्या सच मे आप इन फूलोंको नही जानते??कुछ याद नही आपको?"नीरा बेताब हो उठी।
"नही तो!!देखिए,मैंने कहा ना,आप किसी गलत जगह पोहोंच गयी है!"निरंजन ने हल्की-सी मुस्कान के साथ फिर एकबार कहा।
"ओह!"'नीरा के होटों से एक अस्फुट-सी आह निकली।कुर्सी को थामते हुए डगमगाते क़दमों से खडी हुई,और धीरे, धीरे दरवाज़े की ओर बढ़ी....
दरवाज़े का नोब घुमाते हुए एक बार फिर उसके दिल ने चाहा,जैसे वो घूम जाये,निरंजन से सीधा सवाल करे,"क्या तुम वही निरंजन नही हो? वही निरंजन,जिसने बीस साल पहले एक चौदह वर्षीया लडकी को ये घंस के फूल थमाये थे,उसे ऎसी निगाहोंसे देखा था,जिसे वो लडकी आज तलक भुला नही पायी?निरंजन !मैं वही लडकी हूँ!क्या अब भी मुझे जानोगे नही?"

लेकिन तबतक डाक्टर ने अगले patient के लिए बेल बजा दीं थी। वो बाहर निकली। कुछ ही देर पहले खुशनुमा हवामे लहराती एक चुनर तूफान की जकड मे मानो तार,तार हुई जा रही थी।
थोडी देर काउंटर को पकड़ के नीरा खडी हो गयी। अपने आप पे काबू पाने की भरसक कोशिश करती रही। फिर उसने अपने पर्समे से ,जिस होटल मे वे लोग रुके थे ,उसका फ़ोन number ,रूम नंबर तथा नाम receptionist को थमाते हुए बोली,"please,ज़रा इस नंबर पे मेरी बात करा देंगीं आप?"

फ़ोन मिलाके receptionist ने नीरा को थमाया।
"हलो... ,"धीरेसे नीराने कहा।
"हलो...!नीरा??कहाँ से बोल रही हो??क्या बात है?"उधर से विपुल की चिंतित आवाज़ आयी।
"सुनो,विपुल,मैं रास्ता भटक गयी थी। किसी गलत फ़हमी मे, किसी डाक्टर निरंजन कुमार की अस्पताल मे आ गयी। तुम यहाँ आकर....."
"अरे,तो अपने होटल का नाम बता के रास्ता पूछ लो!इतना मशहूर होटल है.....कोयीभी रास्ता बता देगा....घबराओ मत",विपुल ने उधर से कहा।
"नही विपुल,अब मुझ मे कार चलाने की हिम्मत नही। दरअसल तबीयत कुछ खराब लग रही है। तुम यहाँ आके मुझे ले जाओ please!"नीरा ने इल्तिजा भरे स्वर मे कहा।
"देखा ना मैं पहेले ही कह रहा था,गाडी चलाने की तुम्हें आदत नही है। ठीक है,पहोचता हूँ वहाँ। ज़रा ठीक से नाम बताना तो!"
नीरा ने नाम बताया और विपुल ने फ़ोन रख दिया।

बाहर तो धूप थी,लेकिन नीरा की आखोँ मे बंद, वो एक निरंतर पल, बूँद-सा फिसल कर वक़्त के घने कोहरे मे खो गया। वो ठगी-सी,लुटी-सी देखती रही।
उसने पर्स मे से वो लिफाफा निकाला,जिसमे वो नीले-पीले फूल सहेज के देहली से चली थी,बरसों सँजोए फूल!वेटिंग रूम के कोने मे एक कूडादानी थी। नीरा ने उसमे धीरे से लिफाफा छोड़ दिया।

विपुल तेज़ी से सीढियाँ लाँघता हुआ बढ रहा था..... नीरा ने झट धूप का चश्मा आँखों पर लगा लिया..... कहीँ विपुल उन सजल आँखों मे की धुन्द देख ना ले.....
"तुम भी कमाल करती हो नीरा!!अस्पताल कैसे पोहोंची?जाना कहाँ चाह रही थी??मैं कह भी रहा था होटल की कार लेलो,लेकिन पता नही उस समय तुम्हारे सर पे क्या सवार था??"विपुल बोलता चला जा रहा था।
"कुछ नही,विपुल,जो सवार था,उतर गया। बस ऐसेही अकेले कुछ वक़्त गुज़रना चाहती थी ",नीरा ने अपने आप को ज़ब्त करने की भरसक कोशिश करते हुए कहा। अब शिमला की वो हँसीं वादियाँ उसके लिए रेगिस्तान की वीरानियाँ बन चुकी थीं.....

रात मे काम ख़त्म करके निरंजन्कुमार अपने निवास पे डायरी लिख रहे थे.....
"नीरा!!पहली बार मुझे उसका नाम मालूम हुआ। जब मैंने उसे कमरेमे घुसते देखा,तो मैं स्तब्ध रह गया। इतने वर्षों बाद मेरे सामने वही आँखें ,जिन्हें मैंने किस किस मे नही तलाशा! उन आँखों को मैं भला भूला ही कब था??
अपने आपको कितनी मुश्किल से सम्भाला!अब भी वे आँखें वैसी ही थीं!उतनी ही निश्छल, निरागस !जब मैंने पहचान नेसे इनकार किया तो उफ़!कितनी आहत ......!उनमे की दीप्ती जैसे बुझ-सी गयी....पलभर लगा,बढ कर उसे थाम लूँ,और कह दूँ,"हाँ नीरा,मैं वही निरंजन हूँ,जिसे खोजती हुई तुम यहाँ आयी हो....
"लेकिन बड़ी निर्ममता से मैंने खुदको रोका..... वो शादीशुदा थी..... उसके कार्ड पे लिखा था,मिसेस नीरा सेठ। हमारे रास्ते कबके जुदा हो चुके थे.....
"प्रथमत: मुझे लगा,वो वाकयी patient के तौर पे आयी है। इतने वर्षों तक उसने मुझे याद रखा होगा,ये तो मैं सोंच भी नही सकता था। जब हम पहली बार मिले थे,तब मैं था ही क्या??केवल एक वेटर!!लेकिन जब एहसास हुआ कि वो मेरी ही खोज मे है तो हैरानी के साथ असीम ख़ुशी भी महसूस हुई। फिर भी मैंने निर्दयता से अपरिचय जताया। नियती की विडम्बना ही सही,लेकिन हम दोनो के वजूद का सम्मान अपरिचय बनाए रखने मेही था.......वरना पता नही उस मृगजल के धारा प्रवाह मे पतित हो हम किस ओर बह निकलते!!उबरना कितना मुश्किल होता!वक़्त उसे मरहम लगा ही देगा। वक़्त!!किसी भी डाक्टर से बड़ा डाक्टर!!
लेकिन सोंचता हूँ तो सिहर उठता हूँ!!मेरे प्रती इतनी गहरी आसक्ती रखते हुए,उसने अपने पती के साथ इतने साल कैसे बिताये होंगे!!अतीत को अनागत मे बदल ने के प्रयास मे क्या उसने अपना वर्तमान नही खोया होगा??मैंने तो शादी ही नही की। उन आखोँ की गिरफ्त मे गिरफ्तार, मैं रिहा कब हुआ??लेकिन नीरा??
"अच्छा हुआ इन फूलों का लिफाफा वो मेरे अस्पताल मे फेँक गयी....... भगवान् करे इन फूलों के साथ,साथ वो अपनी सँजोई यादेँ भी फ़ेंक दे..... वो यादें और ये नीरा के स्पर्शित फूल,अब मेरी धरोहर रहेँगे...... शायद मेरे ना पहचाननेसे वो मुझ से नफरत ही करने लगी हो। लेकिन उसके लिए तो इस मोहमयी मृगत्रिष्णा से ये नफरत ही अच्छी। "

डाक्टर निरंजन ने अपनी डायरी मे बडे जतन से वो फूल रखे और धीरे से उसे उठा अपने सीने से लगा लिया। अनायास ही उनकी ऑंखें भर आयी।
सम्पूर्ण।

7 टिप्पणियाँ:

परमजीत बाली said...

शंमा जी ,कहानी अच्छी है। लेकिन कहानी नही हकीकत लगती है।आप अच्छा लिखती हैं। आगे इन्तजार है।

उन्मुक्त said...

पढ़ता था क्या

परमजीत बाली said...

शमा जी,आप की अभी-अभी मैने आपकी टिप्पणी पढी और जैसा कि आप ने बताया कि आप की कहानी पूरी हो गई जान कर खूशी हुई ।
पूरी कहानी पढ चुका हूँ"नीले पीले फूल"आप ने नारी ह्रदय की कोमल भावनाओं को बखूबी व्यक्त किया है।अपनें कहानी के पात्रों को भी एक सम्मान प्रदान किया है ।बहुत अच्छा लगा। आप की लिखी कहानी मुझे बहुत पसंद आई। मै चाहता हूँ कि आप कि इस कहानी को अन्य पाठक भी पढे । यदि आप अनुमति दे तो मै इस कहानी का लिंक अपनी पोस्ट पर दे दूँ। ताकि एक कहानीकार (शमा)को पाठको के सामने लाने का श्रैय मै पा सकूँ। कृपया सूचित करे।

उन्मुक्त said...

क्या आप ने इसी पोस्ट में कहानी पूरी कर दी? इसी पर तो मैंने पहले टिप्पणी की थी।
आप भी भावनाओं में बहती हैं।

ऒशॊदीप said...

अच्छी कहानी है।पसंद आई।

abhivyakti said...

AAPKI KAHANI ME PRAVAH AUR JIGYASU PRAVRITI HAI JO KAHANI KA ATYAVSHYAK GUN HAI.KAHANI BAHUT NAYI SI NAHI HAI KINTU SUNDER PRASTUTI KE KARAN BAHUT ACHCHI AUR PATHNIYA HAI.

Irshad said...

लोगो को एक जीवन मिलता है शमा जीने के लिये लेकिन तुम तो गजब किये देती हो कितने रूपों मे जी रही हो, अपनी कहानीयों में, कविताओं में जीऐ चली जा रही हो। नीरा कोई और नही कही पर किसी कोने में उसके मन से तुम्हारा मन भी तो मिलता है। तुम्हारे भोगे हुए सुख और दुख आज तुम्हारी सबसे बड़ी दौलत बन गये है। तुम अपने अनुभवों को किरदारों के रूप में ढालकर साफ-साफ बचकर निकल जाती हो। कमाल कर जाती हो। इतना सबकुछ देखलेने पर भी, जानलेने पर तुम्हारे पास कितना कुछ नया बचा है। तुम वोही बांट रही हो। कल कोई और किरदार निकलेगा, कोई और बात चलेगी। लेकिन तुम्हारी परछाईयां और रंग उन सब में दिखाई देगे।
तुम कहती हो ( नीरा के मन का एक कोना बिलकुल सूना ,अछूता रह गया था। एक सुनसान,अंधेरी गूफा की तरह।) शमा जानती हो अगर नीरा के मन का यह कोना जिस दिन भर गया उस दिन उसकी मौत हो जायेगी। वो इसी पागलपन, इसी खोज में तो है। अपनी अन्धेरी और सुनसान गुफा से बाहर आने की कोशिश ही दुसरों को उजालों का रास्ता दिखा रही है। तुम बस चलती जाओ जहां तक तुम्हे जाना है। एक बात और बताओ ( इतना उत्कंठा भरा इंतज़ार तो नवपरिनीता नीरा ने सुहाग रात के दिन अपने पती का भी नही किया था।) इस तरह की पंक्तिया आपको सुझ कहां से जाती है।

Sunday, March 29, 2009

आकाशनीम १५ ,

"घबराओ मत मीनू! ये कोई अदालत नही है। मैनेभी प्यार किया है। अगर तुम्हे स्टीव से प्यार हो गया तो कोई पाप नही है। अपराध तो तुमसे नियातिने किया है। आगे जब भी तुम्हरा दिल घबराए, तुम उदास महसूस करो, मेरे पास चली आना। यकीन मानो, मीनू, मैभी इन आँखों मे ऎसी गहरी उदासी देखता हूँ तो मेरा मन घबरा उठता है। आओ, तुम्हे पूर्णिमाके कमरेमे ले चलता हूँ।"

उस धैर्य और गाम्भीर्य की प्रतिमूर्ती के प्रती मैं और भी नतमस्तक हो गयी। इतने विशाल र्हिदयी पुरुषकी , इतने महान कलाकार की पत्नी होनेका सौभाग्य नियती ने मुझे दिया था लेकिन मेरे साथ ये विडम्बना भी कर डाली थी के ये रिश्ता केवल नाम मात्र के लिए हो कर रह गया था।
येही नियती का विधान था........

और माजी! वो स्नेह की उमड़ती अविरल धरा, जिसने बार, बार सरोबार किया था, जिसने मुझे दियाही दिया था, माँगा कुछ नही था, उनके बारेमे क्या कहूँ!!उनकी उम्र ज्यादा नही थी। मुझे याद आया, दीदी के विवाह का दिन, जब सब माजी को नरेंद्र की बड़ी बहन समझ रहे थे। तेजस्वी कान्ती,गौरवर्ण , काले घने बाल, फूर्तीली चाल,हँसमुख, शालीन चेहरा, किसेभी मोह ले! दीदीकी मृत्युने उनके जीवनके कई साल छीन लिए थे। वे बुढिया गयी थीं।

उनके मृत्युकी पूर्व संध्या मुझे याद है। बेहद कमजोर हाथोंसे उन्होने मेरे माथेको छुआ था और कहा था," बेटी, मैं तेरी रुणी हूँ। तूने पूर्णिमा और नरेंद्र के लिए, मेरे लिए, इस घरके लिए अपना जीवन अर्पण कर दिया। बदलेमे तूने क्या पाया ये मैं नही जानती, लेकिन क्या खोया ये जानती हूँ। किसी ना किसी रुपमे, कभी ना कभी, तेरा समर्पण तुझे फल देगा। इंतज़ार करना।"

मैं अवाक् सुन रही थी। मैंने उस दुबले पतले शरीरमे अपना मूह छुपाया और अपने आसुओं को राहत देदी। माजीने सूरजकी पहली किरनके साथ आख़री साँस ली थी....
क्रमशः